حمد نعت مناقب اہل بیت منقبت نوحہ مناقب قطب المدار صلاۃ و السلام رباعی غزل

कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं

On: March 5, 2025 4:41 PM
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 कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं

जुज तेरे आका मेरा कोई मदद गार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


यह जमाना है अजब अय शहेन्शाहे हलब

जब तलक है मतलब तब तलक मिलते हैं सब

बे गरज कोई भी देता है यहां प्यार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


कौन है अपना भला कुत्वे दीं तेरे सिवा

किसको आवाज मैं दूं किसको आका दूं सदा

बहरे इम्दाद कोई आता ही सरकार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


उनके मंगतों के लिये रब ने दर खोल दिये

उनके आँसू जो बहे तो गोहर खोल दिये

क्या गदा तेरा गदाए शहे अबरार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


ठोकरें खायी बहुत तेरे दरबार में हूं

दिल लिये आया शहा तेरे बाजार में हूं

कोई इस टूटे हुये दिल का खरीदार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


मेरे चेहरे पे जमीं गुम की क्या गर्द नहीं

कोई सुख दुख का नहीं कोई हमदर्द नहीं

क्या मेरे अपने ही मेरे लिये अग्यार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं


एक दिन आयेगा जब बेनिशां हम होंगे

खाके पा गर हैं तेरी कहकशा हम होंगे

हम शजर वाकई शोहरत के तलबगार नहीं


कोई गमख्वार नहीं, कोई गमख्वार नहीं
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