खुदा रा मेरी आरजू है कि बीते मेरी उम्र नातें सुनाते सुनाते
मरूं इश्के अहमद को सीने में लेके उठूं कब्र में गीत आका के गाते
कभी उठ के आजाइये मेरे आका मदीने से खुशियों की बारात ले कर
कि इक उम्र बीती है गुमख्वारे आलम मुझे बोझ गम का उठाते उठाते
दो आलम के जितने भी सजदे हों लाओ मगर उसकी कोई न तमसील होगी
जो सजदा किया मेरे शब्बीर ने है सरे करबला सर कटाते कटाते
उमर ले के तलवार है साथ उनके हुए आज हैरां यह कुफ्फार सुन के
तो क्यूं मुशरिकी खौफ से रुक न जाएं हबीबे खुदा को सताते सताते
उस अन्दाज से जैसे पहुंचे थे जामी किसी दिन हमारी हो आका सलामी
किसी दिन मदीने पहुंच जाऊं आका हर इक से मैं खुद को छुपाते छुपाते
तेरी ऐ शजर पूरी होगी तमन्ना दिखाएंगे तुझ को भी आका मदीना
तुझे हो ही जाएगा दीदारे तैबा गमे शह में आंसू बहाते बहाते
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