حمد نعت مناقب اہل بیت منقبت نوحہ مناقب قطب المدار صلاۃ و السلام رباعی غزل

बे घरों पर जुल्म की है इन्तिहा परदेस है

On: March 5, 2025 4:41 PM
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 बे घरों पर जुल्म की है इन्तिहा परदेस है

और आले मुस्तफा बे आसरा परदेस है


देस की मि‌ट्टी बहुत आले नबी से दूर है

उनका हामी कौन है परदेस में मजबूर है

जुल्म जितना भी करे जालिम इन्हें मन्जूर है

छुट पायेगा न दामन सब्र का परदेस है


हर कदम पर मुश्किलें हैं हर कदम पर इम्तिहां

यह नबी की आल को तकदीर है लायी कहां

जल गये खेमें हैं सब और लुट गया है आशियां

अब कहां जायेगी आले मुस्तफा परदेस है


प्यास की शिद्दत बढ़ी है असगरे मासूम को

तीन दिन से मिल सका पानी न इस मजलूम को

तीरों से छलनी न कर मासूम के हलकूम को

कर न जख्मी तू ये नन्हां सा गला परदेस है


हजरते असगर ने ये शह को लिखा सन्देस में

लुत्फ आता ही नहीं जीने का अब तो देस में

जब से बाबा तुम गये हो देस से परदेस में

देस अपना वाकई लगने लगा परदेस है


हैं बहत्तर सिर्फ हम फौजे अदू लाखों में है

एक दूजे से जुदा होने का डर आँखों में है

सल्तनत मुस्लिम नुमा कुफ्फार के हाथों में है

अल मदद मौला अली मुश्किल कुशा परदेस है


अय खुदा रह में तेरी घर बार को कुर्बा किया

आसियों के वास्ते बख्शिश का है सामाँ किया

उम्मते सरकार पर इतना बड़ा इहसां किया

आखरी करते हैं शह सजदा अदा परदेस है


शम्मे हक पर है किया कुर्बाँ भरे घर बार को

कर दिया शादाब तूने दीन के गुलजार को

तोड़ डाली सब्र से है जब्र की तलवार को

है हसीं शब्बीर तेरी हर अदा परदेस है


है यही इज्जत भी तेरी है यही दौलत तेरी

तेरे दिल में है मुहब्बत अहले बैते पाक की

है गमे शब्बीर ही तेरे लिये वज्हे खुशी

अय शजर दिल में इसे ले तू छुपा परदेस है
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